विपक्ष के कदम ने केंद्र पर बनाया दबाव; बिहार-कर्नाटक व तेंलगाना के जाति सर्वेक्षण से बदली स्थिति
आगामी जनगणना में जाति गणना को शामिल करने का केंद्र सरकार का कदम राष्ट्रीय नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव भले हो सकता है, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञ केंद्र के इस निर्णय के पीछे बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना की ओर से कराए गए जाति सर्वेक्षण का नतीजा देखते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इन तीनों राज्यों की पहल और इसके बाद विपक्ष की ओर से लगातार इसे चुनावी मुद्दा बनाने के चलते ही केंद्र सरकार को मजबूरी में जाति गणना की घोषणा करनी पड़ी। हालांकि, जाति गणना के परिणामों को लेकर विशेषज्ञ बंटे हुए हैं। एक खेमा जहां यह मानता है कि इससे राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को आकार देने के साथ ही कल्याणकारी योजनाओं और चुनावी रणनीतियों को अमलीजामा पहनाने में बहुत मदद मिलेगी वहीं दूसरा खेमा मानता है कि इससे सामाजिक विद्वेष बढ़ने का खतरा है।
जाति गणना कराने वाले तीन राज्यों में से कर्नाटक और तेलंगाना कांग्रेस शासित हैं, जबकि तीसरे राज्य बिहार में जब सर्वेक्षण हुआ था उस वक्त कांग्रेस तत्कालीन नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन सरकार का हिस्सा थी।
तेलंगाना : जाति जागरूकता पर आधारित राजनीतिक बदलाव
तेलंगाना के सर्वेक्षण का दायरा बहुत व्यापक था। इसमें जाति, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और राजनीतिक भागीदारी शामिल थी। मात्र 50 दिनों में 96.9% घरों को कवर करने वाला यह सर्वेक्षण 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस का एक प्रमुख चुनावी वादा था। बीआरएस पर पार्टी की शानदार जीत का श्रेय आंशिक रूप से गौड़, मुन्नुरू कापू और यादव जैसे पिछड़े समुदायों को दिया गया। सर्वेक्षण रिपोर्ट में पिछड़े वर्गों (बीसी) की आबादी 56.33%, एससी की 17.43% और एसटी की 10.45% बताई गई, जबकि अन्य जातियों (ओसी) की आबादी 15.79% होने का अनुमान है। वास्तविक संख्या में पिछड़े वर्ग की संख्या लगभग 2 करोड़ थी, जिसमें 35 लाख से अधिक पिछड़े मुस्लिम शामिल थे। अनुसूचित जातियों की संख्या लगभग 61.8 लाख और अनुसूचित जनजातियों की संख्या लगभग 37 लाख थी। पिछड़े समुदायों की संख्या लगभग 44 लाख थी। कुल मुस्लिम आबादी 44.57 लाख या कुल आबादी का 12.56% थी। इनमें से 10.08% बीसी मुस्लिम और 2.48% ओसी मुस्लिम थे। पिछले विधानसभा चुनाव में बीआरएस ने 22 सीटें पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों को आवंटित की थीं, जबकि कांग्रेस और भाजपा ने क्रमशः 34 और 45 पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार मैदान में उतारे थे।
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